SANTHALDISHOM(সানতাল দিশোম)

Tuesday, 9 April 2019

लोकसभा चुनाव बस्तरः 'आदिवासी डर कर पोलिंग बूथ पर गए ही नहीं, मगर वोट पड़ गए'

छत्तीसगढ़, बस्तर

लोकसभा चुनावों के पहले चरण में छत्तीसगढ़ की सिर्फ़ एक सीट पर मतदान होगा. ये सीट है बस्तर, जहाँ चुनाव करवाना एक जंग लड़ने के बराबर है.
बस्तर के सुदूर इलाक़ों में माओवादी छापामारों की समानांतर सरकार चलती है जो चुनावी प्रक्रिया को ख़ारिज करते हैं और चुनावों के बहिष्कार की घोषणा करते हैं.
माओवादी अपनी सरकार को 'जनताना सरकार' कहते हैं जिसका बस्तर संभाग के बड़े हिस्से में ख़ासा प्रभाव देखा जा सकता है.
इस संभाग के बड़े हिस्से पूरी तरह से कटे हुए हैं, जहां न मोबाइल नेटवर्क है और ना ही सड़कें. कई गांव ऐसे हैं जहां तक पहुंचना और चुनाव कराना बड़ी चुनौती है.
वैसे तो बस्तर संभाग का हर बूथ संवेदनशील है, मगर माओवादी हमलों को देखते हुए कई मतदान केंद्रों का स्थानांतरण किया गया है.

आपको ये भी रोचक लगेगा

छत्तीसगढ़, बस्तर
कुछ बूथ 20 किलोमीटर तो कुछ उससे भी ज़्यादा दूर स्थानांतरित किये गए हैं जिससे ग्रामीणों को काफ़ी परेशानी होती है. ग्रामीणों के सामने वोट डालना एक बड़ी चुनौती है.
इस संघर्ष ने बस्तर के सुदूर जंगल के इलाकों के रणभूमि में तब्दील कर दिया है. और, संघर्ष की वजह से चुनाव कराना भी एक जंग ही लड़ने के बराबर है.
इलाक़े की भौगोलिक परिस्थिति और संवेदनशीलता को देखते हुए अर्ध सैनिक बलों के पचास हज़ार जवान मैदान में उतारे गए हैं. इनके अलावा राज्य पुलिस के जवान भी तैनात किये गए हैं.
सिर्फ एक सीट पर उतने सुरक्षा बल के जवान उतारे गए हैं जिनसे पूरे राज्य में चुनाव करवाया जा सकता है.
माओवादी छापामारों और सुरक्षा बलों के बीच लंबे समय से चल रहे संघर्ष की वजह से सुदूर इलाकों में आवाजाही के साधन नहीं हैं. माओवादी रह रह कर धमाके कर चुनावी प्रक्रिया को बाधित करने की कोशिश करते रहते हैं.
छत्तीसगढ़, बस्तर
माओवादियों के चुनाव बहिष्कार के आव्हान के बाद बस्तर के अंदरूनी संवेदनशील इलाकों से मतदान केंद्रों को दूसरी जगहों पर 'शिफ्ट' कर दिया गया है. और जहाँ पर बूथ बनाए गए हैं उनकी दूरी दस किलोमीटर से 15 किलोमीटर या 20 किलोमीटर तक की है. ग्रामीण आदिवासियों का कहना है कि उनके लिए इतनी दूर तक जाकर वोट डालना बहुत मुश्किल का काम है."
छत्तीसगढ़, बस्तर
Image captionदंतेवाडा जिले के फुल्फार्ड गांव के निवासी सोनाराम बरती.
दंतेवाडा जिले के फुल्फार्ड गांव के निवासी सोनाराम बरती का मानना है कि मतदान केन्द्रों को इतनी दूर ले जाना ग़लत है क्योंकि इससे गाँव के लोगों को बड़ी परेशानी होती है. खास कर तब जब आवाजाही के साधन न हों.
मगर चुनाव आयोग और प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि चुनावों के दौरान माओवादी हमले बढ़ा देते हैं. वो सुरक्षा बलों और मतदान कर्मियों पर हमले करते हैं इस लिए मतदान कर्मियों के दल को सुदूर इलाकों में भेजना मुश्किल काम है.
अनुमंडलीय पुलिस अधिकारी पिताम्बर पटेल कहते हैं कि माओवादी चुनावों के दौरान सबसे ज्यादा हमले इसलिए करते हैं ताकि वो सुरक्षा बलों से हथियार और असलाहा छीन सकें.
जंगलों तक जाने वाले रास्तों पर बारूदी सुरंगों का जाल बिछे होने का ख़तरा बना रहता है.
छत्तीसगढ़, बस्तरइमेज कॉपीरइटBBC SPORT
Image captionअनुमंडलीय पुलिस अधिकारी पिताम्बर पटेल
बीबीसी से बात करते हुए पटेल कहते हैं , "स्थानीय स्तर पर अनेक परिस्थितियाँ ऐसीं हैं कि मतदान दलों को सुरक्षा के दृष्टिकोण से उतनी दूर पहुंचाना संभव नहीं होता. इसलिए मतदान केंद्रों को ही दूसरी सुरक्षित जगहों पर ले जाया जाता है. प्रशासन की ओर से पूरे प्रयास रहते हैं कि ग्रामीण अधिक से अधिक संख्या में आयें और वोट डाल पाएं. साल 2018 के चुनावों में एक भी मतदान केंद्र ऐसा नहीं रहा जिसमे मतदाता ना आया हो. भले ही उसको 60 किलोमीटर शिफ्ट किया गया था."
सरकारी दावों के हिसाब से उन बूथों पर भी अब वोट पड़ने लगे हैं जहां पहले एक भी वोट नहीं डाला जाता था. मगर गाँव के लोगों के दावे अलग हैं.
छत्तीसगढ़, बस्तर
हेमंत कुमार मंडावी, सुदूर गिरोली गाँव के रहने वाले हैं. ग्रामीणों की परेशानियों को साझा करते हुए वो मतदानकर्मियों पर ही फ़र्ज़ी तरीके से वोट डालने का आरोप लगाते हैं.
वो कहते हैं: "पिछली बार, पोलिंग बूथ पर जिन लोगों की ड्यूटी लगती थी, उन्होंने दो चार लोगों के वोट खुद ही दबा दिए थे. गाँव वाले तो कोई गए ही नहीं थे डर के मारे. सब अपनी खेती बाड़ी में लगे हुए थे."
बस्तर संभाग में चुनावी प्रक्रिया उतनी आसान भी नहीं है. कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने न पिछली बार वोट डाला था और ना इस बार वो वोट डालेंगे. सबकी अपनी अपनी मजबूरियां हैं.
जनजातीय समुदाय से आने वाले मंगल कुंजाम ने माओवादी इलाकों में चुनाव की समस्या पर बनी हिंदी फिल्म 'न्यूटन' में पत्रकार की भूमिका निभायी थी. उनका गाँव गुमियापाल भी शहरी इलाके से 12 किलोमीटर दूर है और वहां भी माओवादियों के बहिष्कार का ख़ासा असर है.
गुमियापाल से मतदान केंद्र को 12 किलोमीटर दूर स्थानांतरित कर दिया गया है. मगर मंगल कुंजाम कहते हैं कि उनके गांव के लोग वोट डालने नहीं जाते.
छत्तीसगढ़, बस्तर
कुंजाम का कहते हैं, "2005 से पहले जो चुनाव होते थे तब हमारे इलाक़े में सभी लोग वोट डालते थे. जब से माओवाद का प्रभाव पड़ा इलाक़े में, तब से तो हमलोग वोट ही नहीं डाल रहे हैं. पिछले विधान सभा के चुनावों में भी वोट नहीं डाले, इस बार भी नहीं डालेंगे. किसी इलाके में माओवादियों का क़ब्ज़ा हो और मैं बहिष्कार के आव्हान के बावजूद वोट डालने जाता हूँ तो मेरी सुरक्षा की जवाबदेही किसकी होगी ?"
अपना अनुभव बताते हुए वो कहते हैं कि एक बार उन्हें वोट डालने के लिए माओवादियों के ग़ुस्से का सामना करना पड़ा और माफ़ी भी मांगनी पड़ी.
बस्तर का पूरा संभाग आदिवासी बहुल है. यहाँ के सर्व आदिवासी समाज का कहना है कि सुदूर अंचलों में रहने वाले जनजातीय समुदाय के लोग बाक़ी की दुनिया से कटे हुए हैं. उन्हें आजतक चुनावी प्रक्रिया के बारे में कुछ भी पता नहीं है.
समाज के महासचिव धीरज राणा कहते हैं, ''जैसे मुखिया या सरपंच ने कह दिया चलने को तो गाँव के लोग आँख बंद कर के चल देते हैं. चाहे वोट देनें जाना हो या फिर किसी पार्टी की रैली में जाना हो. उनका कहना है कि आदिवासी समाज के लोगों को ये नहीं मालूम कि वहां पर किस लिए जा रहे हैं. कोई जानकारी नहीं है. वोट देना है तो बटन कहाँ दबाना है, इसकी भी जानकारी उनको नहीं होती है.''
छत्तीसगढ़, बस्तरइमेज कॉपीरइटGETTY IMAGES
चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन ने मतदाताओं को जागरुक करने की मुहिम तो चलायी है. मगर ये मुहिम सिर्फ शहरी इलाकों तक ही सीमित है. चुनाव के दौरान अंदरूनी इलाकों में रहने वालों के बीच डर समाया रहता है.
मलोश्नार गाँव के रहने वाले बलराम भास्कर के अनुसार, जब से माओवादियों और सुरक्षा बलों के बीच संघर्ष और भी ज़्यादा सघन हुआ है, तब से आदिवासी समाज के लोग, अधिकतर जो लोग शहर से 15 या 20 किलोमीटर दूर रहते हैं, वो डर डर के ही रहते हैं. उन्हें भरोसा नहीं है कि इन इलाकों में संघर्ष के बीच उनकी और उनके परिवार वालों की ज़िन्दगी कितने दिनों की है.
राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच चुनावों का उत्साह सिर्फ शहरी इलाकों तक ही सीमित क्यों ना हो, दहशत के साए के बीच बस्तर के सुदूर इलाकों के आदिवासियों में लोकतंत्र की इस प्रक्रिया के लिए कोई रूचि नहीं दिखती. वो तो बस अपनी संस्कृति और अपने जंगलों तक ही सीमित रहना चाहते हैं.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

সেন্দরা করলে বন্যা প্রাণীরা বছর কে বছর বেড়ে যায় এমনই প্রস্তাব আদিবাসীদের

ভঞ্জ মুলুক:- ভারত জাকাত মাঝি পারগানা মহল শালবনি ভঞ্জ মুলুকের সমস্ত পীড়ের পীড় পারগানা বাবা ও মাঝিবাবাদের  নিয়ে এক আলোচনা সভা হল ভঞ্জ মুলুক ধরম গাড়ে । শালবনি ভঞ্জ মুলুকের সমস্ত পীড়ের পীড় পারগানা  বাবাদের উপস্থিতিতে ঐদিন বর্তমান পরিস্থিতি অর্থাৎ আদিবাসীদের শিকার প্রশাসনের পক্ষ থেকে বন্ধ নিষেধাজ্ঞা জারির নিয়ে বিস্তারিত ভাবে আলোচনা করা হয়।

কেননা এখন বর্তমানে আদিবাসীদের শিকার বন্ধ নিয়ে প্রশাসনের পক্ষ থেকে নানা রকম পদক্ষেপ নেওয়া হচ্ছে আদিবাসীদের বিরুদ্ধে। এবং এই নিয়ে আজ সমস্ত আদিবাসী সমাজকে সচেতন থাকতে হবে, এনিয়ে বিস্তারিত ভাবে ঐদিন মুলুক ধর্ম গাড়ে আলোচনা করা হয়। ঐদিন আলোচনা সভা থেকে সমস্ত পীড়ের পীড় পারগানা বাবারা  জানাই যে আদিবাসীদের শিকার বন্য প্রাণী হত্যা করে শেষ করার জন্য নয়

বরং আদিবাসীরা স্বীকার করলে বছর কে বছর আবার প্রাণী বেড়ে যায় ।আদিবাসীরা যে সব প্রাণীকে শিকার করে তারা কখনো বিলুপ্ত হয়নি কিন্তু চোরা শিকারীরা যেসব প্রাণীকে শিকার করে তারা বিলুপ্ত হয় । কিন্তু বাস্তবে যারা বনজ সম্পদ ধ্বংস করছে, প্রাণী হত্যা করছে ও হাতির দাঁত এবং বাঘের চামড়া বিক্রি করছে তাদের বিরুদ্ধে কেন প্রশাসন পদক্ষেপ নিচ্ছে না ? বড় বড় কোম্পানির হাতে শিল্পায়নের জন্য বিশাল বনভূমি তাদের কে তুলে দেওয়া হচ্ছে ।

এবং যারা আদিবাসীরা বন জঙ্গল কে রক্ষা করে তাদের কে কেন বনাঞ্চল থেকে উৎখাত করা হচ্ছে ? তাহলে কি সেটা ওই বড় বড় কোম্পানি দের জন্য ? এরকম আরোও নানান প্রশ্ন ওই দিন পারগানা বাবারা তুলে ধরেন। ঐদিন আরোও বিস্তারিতভাবে সামাজিক পরিকাঠামো নিয়েও আলোচনা করা হয়। আদিবাসী সামাজিক ব্যবস্থা কে সুষ্ঠুভাবে পরিচালনা করার জন্য এবং আদিবাসী মানুষকে একজোট হওয়ার জন্য ঐদিন তারা ভঞ্জ মুলুক ধরম গাড়ের  বঙ্গা বুরুদের নিকট প্রার্থনা করে।

DURGAPUR DISHOM MAK MODE

Image may contain: text

Santal indigenous community celebrates ‘Baha Porob’

The Santal indigenous community in Gobindaganj subdistrict of Gaibandha district  welcomed spring in a festive manner through “Baha Porob,” traditional spring celebration on 12 March. 
Baha means flower in the Santal language, for which the festival is also known as festival of flower
The Baha Porob celebration community organized the festival jointly with Obolombon, a non-profit organization, with support from the Human Rights Programme of the United Nations Development Programme (UNDP).
People of the Santal community joined the festival with enthusiasm. Santal women wore flowers, and danced and sang which created the festive mood.
Besides villagers, various Santali cultural groups and artistes performed on the occasion. Everybody was mesmerized by their performances on Santali music and dance.
The program was presided over by Philemon Basak, president of the celebration committee. Gaibandha-4 MP Monowar Hossain Chowdhury was present on the occasion as chief guest while municipal Mayor Ataur Rahman was present there as special guest.
Shankar Pal and Mahbubul Haque from UNDP, advocate Sirajul Islam Babu, researcher Kerina Hasda, Prisila Murmu, Naren Basak, president of Pargana Parishad were also present during the festival, among others.

Monday, 8 April 2019

দাঁতন মুলুকের সাঁওতা সেপেঞ পীড়ের পীড় পরগনা বাবাদের পুনর্গঠন করা হল

 খবর দাঁতন:-গত  ৭ই এপ্রিল ভারত জাকাত মাঝি পারগানা মহলের পশ্চিম মেদিনীপুর জেলার দাঁতন মুলুকের ৬ নম্বর সাওতা সেপেঞ পীড়ের পীড় পারগানা বাবাদের  পুনর্গঠন করা হলো। ঐদিন ভারত জাকাত মাঝি পারগানা মহলের সামাজিক কাজকর্ম ও সচেতনতামূলক কাজকর্ম নিয়ে বিস্তারিত ভাবে আলোচনা করা হয়।

এবং আদিবাসী সমাজ কে কিভাবে শিক্ষার দিক থেকে এগিয়ে নিয়ে যাওয়া যায় সেনিয়েও বিস্তারিতভাবে আলোচনা করা হয় ওই দিন। নতুন ভাবে  সামাজিক কাজকর্মকে সঠিকভাবে পরিচালনা করার জন্য ঐদিন পারগানা বাবাদের  গঠন করা হয়। পীড় পারগানা বাবা হিসেবে দায়িত্ব নিলেন দেবেন্দ্রনাথ হেমরম জগপারগানা  কৃষ্ণ হাসদা আর পারানিক লক্ষ্মী নারায়ণ হাসদা গডেত  রবীন্দ্র মুর্মু নায়কে় গুজিয় হাসদা ।

ওই দিন পীড় পারগানা বাবাদের পুনর্গঠন অনুষ্ঠানে উপস্থিত ছিলেন রজগাড় মুলুক জগ পারগানা বাবা গোপাল কিস্কু  মুলুক পারানিক মকর মুর্মু মুলুক দ গডেত  রঘুনাথ মুরমু জিয়ার রাকাব পীড় পারগানা  সান্তনু মুর্মু ভূপেন মুর্মু উইহার পীড় সূর্যকান্ত মুর্মু বাবা তিলকা মাঝি পীড় পারগানা  রবীন্দ্র হাসদা। এবং ওই দিন উপস্থিত ছিল ওই পীড়ের সমস্ত  মাঝিবাবা  ও মাঝি হপনরা, মাঝিআয়ো ও মাঝি হপন এরাও  উপস্থিত ছিল।

সাঁওতালি লোকসংগীত ও আবৃত্তি প্রতিযোগিতা অনুষ্ঠিত হল

খবর হুগলি:- আদিবাসী লোকসংস্কৃতি ও সাহিত্যিক রক্ষার উদ্দেশ্যে অনুষ্ঠিত হলো হুগলির উত্তর পাড়াতে লোকসংগীত ও আবৃত্তি প্রতিযোগিতা। হুগলি উত্তরপাড়া রুসিকা মাডোয়া এর উদ্যোগে অনুষ্ঠিত হলো একদিনের জন্য সাঁওতালি লোকো সংগীত ও আবৃত্তি প্রতিযোগিতা। উদ্যোক্তাদের কাছে থেকে জানা যায় যে সাঁওতালি লোকসংগীত আজ হারিয়ে যেতে চলেছে এই কলিযুগে।

বর্তমান প্রজন্মের কাছে সে প্রাচীন আধুনিক লোকসঙ্গীতের কোন রেওয়াজ নেই।দং,লাগড়ে,বাহা,মাঃ মড়ে ইত্যাদি আদিবাসী সমাজে লোকসংগীত রয়েছে কিন্তু সেইসব লোক সংগীত বর্তমান প্রজন্মে অনেকেই জানে জানে না। তাই সে সব লোকসংগীত বর্তমান প্রজন্মের কাছে তুলে ধরার জন্য এই  অনুষ্ঠানের আয়োজন করা হয়।

এবং সেই সঙ্গে সাঁওতালি সাহিত্যকে এগিয়ে নিয়ে যাওয়ার জন্য  আবৃত্তি প্রতিযোগিতা রাখা হয়। ওই দিন ওই মঞ্চ থেকে অনলিয়া বাদল হেমব্রমের একটি সাঁওতালি তরজমা গল্প বই প্রকাশ করা হয়।

Supreme Court order for Adivasi


Adivasi, Forest Dwellers’ Rights

Jhumko Baha Arkesta

Image may contain: 6 people, people smiling, text

Sunday, 7 April 2019

ভোট চাইতে গিয়ে সাঁওতালি গানে নাচলেন নুসরাত

ভোটপ্রচারে গিয়ে নাচলেন নুসরাত

জোর কদমে ভোট প্রচারে নেমেছেন বসিরহাটের তৃণমূল প্রার্থী নুসরাত জাহান। শুটিংকর্ম একদমই ক্লোজ রেখে ভোটপ্রাচারেই ব্যাস্ত তারকা তৃণমূল প্রার্থী নুসরাত জাহান ।
এদিন বসিরহাটের সুন্দরবন লাগোয়া জোগেশগঞ্জে কর্মীসভার আয়োজনে যোগদানরত আদিবাসী মহিলা কর্মীদের সাথে সাঁওতালি নাচে মেতেছেন নায়িকা নুসরাত। এবারের লোকসভা নির্বাচনে তৃণমূলে নতুন তারকারা হলেন মিমি চক্রবর্তী ও নুসরাত জাহান । যাদবপুর কেন্দ্র থেকে মিমি এবং বসিরহাট কেন্দ্র থেকে নুসরাত কে প্রার্থী করেছেন তৃণমূল নেত্রী মমতা । তবে এবার আসানসোল থেকে বাঁকুড়ার বর্তমান সাংসদ মুনমুন সেনকে প্রার্থী করা হয়েছে। এ ছাড়া পুনরায় প্রার্থী হিসেবে নির্বাচন করছেন অভিনেতা দেব এবং শতাব্দী রায় যথাক্রমে ঘাটাল এবং বীরভূম কেন্দ্র থেকে।

কেরল থেকে প্রথম আদিবাসী মহিলা হিসেবে সিভিল সার্ভিস পাশ করলেন এই যুবতী


সদ্য সমাপ্ত সিভিল সার্ভিস পরীক্ষায় পাশ করে নজির গড়লেন কেরলের ওয়ানারের বছর বাইশের যুবতী শ্রীধন্যা সুরেশ। কেরল থেকে প্রথম আদিবাসী মহিলা হিসেবে সিভিল সার্ভিস পাশ করলেন এই যুবতী। তালিকায় ৪১০ র‌্যাঙ্ক করেছেন তিনি। ইতিমধ্যে কেরলের মুখ্যমন্ত্রী পিনারাই বিজয়ন থেকে শুরু করে কংগ্রেস সভাপতি রাহুল গান্ধী শুভেচ্ছা জানিয়েছেন শ্রীধন্যকে। এই ওয়ানার থেকেই এবার লোকসভা নির্বাচনে লড়বেন রাহুল। শ্রীধন্যার এই সাফল্যে তিনি টুইট করেন, ‘‌শ্রীধন্যার কঠোর পরিশ্রম এবং নিষ্ঠা তাঁর স্বপ্নকে বাস্তবায়িত করতে সাহায্য করেছে। শ্রীধন্যা এবং তাঁর পরিবারকে শুভেচ্ছা। আশা করি যে কেরিয়ার সে বেছে নিয়েছে তাতে সফল হবে।’‌ ফেসবুক পোস্টে পিনারাই বিজয়ন লেখেন, ‘‌সামাজিক বাধা বিপত্তির সঙ্গে লড়াই করে দুর্দান্তভাবে সিভিল সার্ভিস পাশ করেছে শ্রীধন্যা। তাঁর এই সাফল্য অন্যান্য ছাত্র–ছাত্রীদেরও উৎসাহ জোগাবে।’ শ্রীধন্যাকে শুভেচ্ছা জানান প্রাক্তন মুখ্যমন্ত্রী ওমান চাণ্ডিও। এদিকে, যাঁকে নিয়ে এত উচ্ছ্বাস, সেই শ্রীধন্যা সংবাদমাধ্যমকে বলেন, ‘আমি যেখানে থাকি, সেটি এ রাজ্যের সবচেয়ে পিছিয়ে পড়া জেলা। এখানে প্রচুর সংখ্যক আদিবাসী থাকেন, অথচ এখান থেকে কোনও আদিবাসী আইএএস অফিসার নেই।‌ আশা করি, আমার সাফল্য ভবিষ্যতে প্রজন্মকে সমস্ত বাধা বিপত্তি টপকে সফল হওয়ার জন্য উৎসাহ প্রদান করবে।’‌‌

সাঁওতালি কথা ও সাহিত্যের উপর জাতীয় স্তরের সেমিনার বাঁকুড়ায়।




 বাঁকুড়া:-অন্য আঙ্গিকে  হল  জাতীয়  স্তরের সাঁওতালি  সেমিনার।বাঁকুড়া বিশ্ব বিদ্যালয়ের  ব্যবস্থাপনায় গত 29 মার্চ  2019।দুপুর 11 টা থেকে বিশ্ববিদ্যালয়ের  সেমিনারে  হলে   বিশেষ অতিথি  রেজিস্টার  ড: দেবাশিষ মজুমদার  প্রদীপ প্রজ্জলনের মাধ্যমের সেমিনারের শুভ সূচনা করেন।সেমিনারে  প্রধান অতিথি  ও  উদ্বোধক ছিলেন বিশিষ্ট  সাঁওতালি  লেখক ও তেতরে পত্রিকার সম্পাদক- মহাদেব হাঁসদা।  উপস্থিত  ছিলেন  বিশ্ববিদ্যালয়  বিভিন্ন  ডিপার্টমেন্টের  প্রফেসারগন ।সেমিনারে "কী নোট"  বক্তব্য  রাখেন সাঁওতালি  ডিপার্টমেন্টের  ভারপ্রাপ্ত  বিভাগীয়  প্রধান  অ্যাসিস্ট্যান প্রফেসার  অঞ্জন কর্মকার। টেকনিক্যাল   প্রথম  সেশনের   চ্যায়ারপারসন ছিলেন মহাদেব  হাঁসদা। 
রিসোর্স  পারসন ছিলেন একাডেমী  পুরস্কার  প্রাপ্ত  লেখক বাদল হেমব্রম। তিনি উপন্যাস  বিষয়ে বক্তব্য  রাখেন  বাদল হেমব্রম।  সিধো কানু বিরসা  বিশ্ববিদ্যালয়ের  সাঁওতালি  ডিপার্টমেন্টের  অ্যাসিস্ট্যান্ট  প্রোফেসর শ্রীপতি  টুডু। তাঁর পেপার ছিল- সাঁওতালি উপন্যাসের ইতিহাস  বিষয়ে।আর এক একাডেমী পুরস্কার প্রাপ্ত লেখক  ভগলা সরেন নাটক বিষয়ে তার বলিষ্ঠ  পেপার উপস্থাপন  করেন। বক্তব্য  রাখেন  মাস্টার  ট্রেনের তথা বাঁকুড়া  বিশ্ববিদ্যালয়ের  সাঁওতালি ডিপার্টমেন্টের  প্রাক্তন অ্যাসিস্ট্যান্ট   প্রোফেসর  রবীন্দ্রনাথ  মুরমু।  মধ্যহ্ন বিরতির  পর বিশ্ববিদ্যালয়  ছাত্রছাত্রীরা  দং নাচ গান পরিবেশন করেন। উল্লেখ,  বিশ্ববিদ্যালয়ের  ভাইশ চ্যানসেলর প্রোফেসর  দেব নারায়ন বন্দ্যোপাধ্যায়  সম্প্রতি বিশ্ববিদ্যালয়ের  জন্য এক জোড়া  করে মাদল, টামাক, রেগড়া , ঝমর কিনে দিয়েছেন।  যা দিয়ে  দারাম অনুষ্ঠান   অভিভূত  করে উপস্থিত  সকলকে।। নৃত্য  ও  বাদক শিল্পী রা দক্ষ  ,শৈলীর পরিচয়  দিয়েছেন। তারপর 
মধ্যাহ্ন বিরতির  পর শুরু হয় দ্বিতীয়  পর্বের টেকনিক্যাল  সেশন।তিনটি স্থানে একই সঙ্গে  শুরু  হয় এই পর্ব।মেইন স্টেজে পেপার প্রেজেন্ট করেন বিভিন্ন  কলেজ ও ইউনিভার্সিটির অ্যাসিস্ট্যান্ট প্রোফেসর  ও রিসার্চ  স্কলার গন।  চেয়ারপারসন  ছিলেন  বির্সামুন্ডা  মেমোরিয়াল কলেজের  সাঁওতালি  ডিপার্টমেন্টের  অ্যাসিস্ট্যান্ট প্রোফেসর  সুনীল কুমার মান্ডী। একই সঙ্গে স্টুডেন্টদের  পেপার প্রেজেন্ট।বিশ্ববিদ্যালয়ের  সাঁওতালি  বিভাগের 313 ও 314 নম্বর  রুমে। চেয়ারপারসন  ছিলেন রানীবাঁধ  ছিঃ কলেজের অ্যাসিস্ট্যান্ট প্রোফেসর   বৈদ্যনাথ  হাঁসদা   ও সীতারাম মাহাতো  কলেজের  অ্যাসিস্ট্যান্ট প্রোফেসর  -রাজ কিশোর মুরমু'। বিদ্যাসাগর , বর্ধমান, বিশ্বভারতী,  সিধো কানু বিরসা  বিশ্ববিদ্যালয়  ছাত্রছাত্রীদের অংশগ্রহণ  করতে দেখা যায়। সেমিনার সুন্দর  ভাবে সফল করতে প্রোফেসরগন  ছাত্রছাত্রীদের  উদ্যোগ  উল্লেখ  করার মতো।ভালিডিক্টোরি সেসন তথা বিদায়ী  পর্বে  ভাষ্য দেন সার সাগুন  পত্রিকার সম্পাদক   মলিন্দ হাঁসদা। ধন্যবাদ  জ্ঞাপন  করেন বাঁকুড়া  ইউনিভার্সিটির ,সাঁওতালি  ডিপার্টমেন্টের  অ্যাসিস্ট্যান্ট প্রোফেসর  -ফটিক মুরমু । তিনি জানান এই বছর সাঁওতালি  বিভাগের  উদ্যোগে তৃতীয়  বছরের সেমিনার।  সকলের সাথে  বাঁকুড়া  ইউনিভার্সিটির ভাইস চ্যানসেলর  প্রোফেসর  দেব নারায়ন বন্দ্যোপাধ্যায়  ও রেজিস্টার  ড: দেবাশিস মজুমদার  সহযোগিতা  ও উৎসাহদান বার বার উল্লেখ  করেন। সেমিনারে  উপস্থিত  সকলে সমৃদ্ধ  হয়েছেন বলে জানা  যায়।

শিখনৗত সান্দেশ

বাহা (পরিমল হাঁসদা)



Saturday, 6 April 2019

অলচিকি লিপি সাঁওতালি ভাষার রক্ষাকবচ

  

সাঁওতালি অস্ট্রো-এশিয়াটিক ভাষাগোষ্ঠীর মুন্ডারী শাখার এক প্রাচীন ভাষা। আজকের সাঁওতাল সম্প্রদায়ের মানুষ রায় এই প্রাচীন প্রবাহমান ভাষাকে পন্থা করে  বিশ্ব দরবারে পৌঁছাতে সক্ষম হয়েছেন। এই সাঁওতালি ভাষা একটি সাংস্কৃতিক সম্পূর্ণ জাতিকে একটি  সুতোয় বেঁধে রেখেছে বহুদিন ধরে। তাই আমরা দেখি সাঁওতালি তে যারা কথা বলে তারা সাঁওতাল গোষ্ঠী বলে পরিচিতি। আবার উল্টোদিকে বলা হয় যে সাঁওতালদের মাতৃভাষা সাঁওতালি।

 আজকে আমরা দেখতে পাচ্ছি আমাদের দেশে অনেক জ্ঞানী পন্ডিত মনীষী স্বাধীনতা সংগ্রামী জন্মেছেন, যাদের মাতৃভাষা সাঁওতালি। যারা সাঁওতালি ভাষার কে ভালবাসেন তারা দেখতে পান যে সাঁওতালি ভাষা একটি সুস্থ রুচিশীল সংস্কৃতিকে সোহাগ দিয়ে বাঁচিয়ে রেখেছে এবং এটাও দেখতে পান যে এই ভাষার একটি উচ্চারণের স্বাতন্ত্র রীতিনীতি  উচ্চারণ শৈলী রয়েছে। যাহা অন্য অন্যান্য ভাষার লিপি বা হরফ দিয়ে সহজে লিখিত রূপ দেওয়া যায় না।

আমি কিন্তু কোন ভাষাবিদ নয় । কিন্তু আমরা আমার মাতৃভাষা সাঁওতালি। তাই বুঝতে পারছি কিভাবে কলকাতার "Sidu Kanhu Dahar"টিকিট বাংলা দৈনিক পত্রিকায় সিধু কানু ডহর হয়ে রয়েছে। সাঁওতালি তে ডাহার শব্দের অর্থ রাস্তা বা রোড। তাই ডাহার এর বিকৃত উচ্চারণ 'ডহর' শব্দটি যারা সাঁওতালি ভাষা কে ভালোবাসে অতিকষ্টে তাদেরকে হজম করতে হয়। এই ছোট্ট উদাহরণ দিয়ে আমাদের বোঝা দরকার যে নির্দিষ্ট ভাষার জন্য নির্দিষ্ট লিপি বা হরফ দরকার।

সাঁওতালি ভাষার সঠিক উচ্চারণ শৈলীকে বজায় রেখে লিখিত রূপ দেওয়ার জন্য পন্ডিত রঘুনাথ মুরমু কোন এক অলৌকিক শক্তি বলে একটি বিজ্ঞানসম্মত জাতিসত্তা বহনকারী অল চিকি নামক লিপি আবিষ্কার করেন। তৎকালীন পশ্চিমবঙ্গে বামফ্রন্ট সরকার শিক্ষার ক্ষেত্রে অলচিকি লিপি কে স্বীকৃতি দিয়ে গেছেন। কারণ অনেক ভাষাবিদ বুদ্ধিজীবী সম্মানিত  দিয়েছিলেন যে অলচিকি লিপি দিয়ে সাঁওতালি ভাষা কে সঠিকভাবে লিখিত রূপ দিতে পারে।

 অলচিকি লিপি আবিষ্কারের পূর্বে থেকে সাঁওতালি ভাষা চর্চা হয়েছে বর্তমানেও হচ্ছে বিভিন্ন লিপিতে। অনেক সাঁওতালি কবি লেখকরা তাদের লেখন বিভিন্ন ভাষার লিপিতে চাপাচ্ছেন অনেক ত্রুটি থাকা সত্ত্বেও। কারণ সাঁওতালি ভাষার কোন সঠিক নিজস্ব লিপি না থাকার জন্য। কিন্তু প্রশ্ন জাগে,লিপির জন্য ভাষা না ভাষার জন্য লিপি? আমার মনে হয় ভাষার জন্যই লিপি। আসলে লিপি হচ্ছে একটি যান বা বহন করা গাড়ি যাহা যাত্রীর ন্যায় ভাষাকে সঠিক গন্তব্যে নিয়ে যায়। এতদিন আমাদের ভাষা ছিল কিন্তু লিপি বা হরফ ছিল না।

তাই নিজস্ব যান বা গাড়ি না থাকলে আমরা যেমন অপরের গাড়ি ভাড়া করে যাত্রা সম্পূর্ণ করি। তেমনি সাঁওতালি ভাষার লিখিত রূপ দেওয়ার ক্ষেত্রে চর্চার ক্ষেত্রে অন্য ভাষার লিপি কে ধার করে সাঁওতালি ভাষার বাহন হিসেবে ব্যবহার করে আসছি। কিন্তু অন্য ভাষার লিপি কে ব্যবহার করে সাঁওতালি ভাষা কে তার সঠিক গন্তব্যে পৌছাতে গিয়ে দেখা যাবে যে কোথাও যেন সাঁওতালি ভাষা নিজের স্বাধীনতা তার সর্বশ্রীকে হারিয়ে এক অজানা ব্যক্তি হিসেবে উপস্থিত  হচ্ছে। আর তাই যদি হয়,ভাষার শিখরে যেতে গিয়ে সাঁওতালি ভাষা কে আরো কয়েকদশক পিছিয়ে পড়তে হবে।   

ভারতবর্ষের আদিতম ভাষা হওয়া সত্ত্বেও আজ একবিংশ শতাব্দীতে সাঁওতালি ভাষা ভারত সরকারের স্বীকৃতি পেয়েছে। এত পিছিয়ে থেকেও শিক্ষার ক্ষেত্রে সাঁওতালি ভাষীদের মধ্যে চরম বিরোধিতার লক্ষ্য করা যাচ্ছে। কারণ সাঁওতালি ভাষা কে সঠিক চর্চা ও মূল্যায়ন করার জন্য কোন লিপি কে বহন করে নিয়ে যাওয়া হবে - অল চিকি তে না বাংলাতে না দেব নাগরিতে না রোমান লিপিতে।

 এই সনাতনী সাঁওতালি ভাষার শিক্ষা ব্যবস্থা এতদিন পিছিয়ে থেকেও যারা এই তর্কে মত্ত তাদের উদ্দেশ্যে বলি নিজেদের ক্ষুদ্র স্বার্থে থেকে বেরিয়ে সাঁওতালি ভাষার বৃহত্তর স্বার্থের দিকে চোখ রাখুন। কারণ অলচিকি ছাড়া অন্যান্য ভাষার লিপি দিয়ে সাঁওতালি ভাষা কে সঠিক ভাবে চর্চা বা মূল্যায়ন করা যাবে না। কারণ অল চিকির যেমন গঠন বৈশিষ্ট্য তেমন সাঁওতালি ভাষা উচ্চারণ ক্ষেত্রেও। যেসব লিপি সাঁওতালি শব্দকোষ কে অজান্তে বিকৃত করতে পারে, সেই সব লিপির জন্য  কতটা অকালতির দরকার। তা আমাদের ভাবা দরকার।

 বিভিন্ন সময়ে বিভিন্ন যুগে বিভিন্ন ভাষার জন্য উপযুক্ত লিপি বা হপর তৈরি করা হয়েছে। তেমনি সাঁওতালি ভাষার জন্য উপযুক্ত লিপি অল চিকি। আর এই লিপি সাঁওতালি ভাষার জন্য কতটা অবাস্তব কতটা ত্রুটিপূর্ণ তার কোনো সমালোচনা নিশ্চয়ই নেই। অথট কিছু ব্যক্তি নিজেদের অলচিকি লিপির অজ্ঞতাকে আড়াল করে বেমানান বিভিন্ন প্রাদেশিক ভাষার লিপি কে সোয়াল করে নিজ সাঁওতাল গোষ্ঠীর মধ্যে দ্বন্দ্ব তৈরি করার চেষ্টা করেছেন।

 আমরা অনেক ভাষা ও লিপি জানি এবং আরোও জানতে চেষ্টা করছি। তেমনি আসুন না একজন সাঁওতালি ভাষী মনীষীর অমর সৃষ্টি অলচিকি হরফ কে জানবো চিহ্নব এবং লিখব। আর তাই যদি করি তাহলে জানা যাবে অল চিকি শুধু সাঁওতালি ভাষার ধারক ও বাহক নয় অলংকারও। কারণ অল চিকি শুধুমাত্র সাঁওতালি ভাষার জন্যই তৈরি।

আমরা আমাদের সৃজনী গুণের নতুন কিছু ভাবতে পারি আলোচনা, সমালোচনার মাধ্যমে একজন স্রষ্টা কে ঘৃণা করতে পারি। কিন্তু নিশ্চয়ই ঘৃণা করতে পারি না তার সৃষ্টিকে। তাই সবাই আসুন না একটা সৃষ্টি কে বাঁচিয়ে রেখে তাকে সমৃদ্ধ করব। তবে সাঁওতালি ভাষা যথাযথ মর্যাদা পাবে। থাকবে সাঁওতালি ভাষার নিজস্বতা তার মৌলিকতা আর স্বাতন্ত্রতা হবে।

 অনেক ব্যক্তি বিভিন্নভাবে সাঁওতালি ভাষা দরদী বলে প্রমাণ করতে চাইছেন কিন্তু আমি মনে করি যারা উচ্চারণগত ধ্বনিগত শব্দগত অক্ষুন্নতা ও অর্থগত বিকৃতি থেকে রক্ষা করে সাঁওতালি ভাষার নিজস্বতা, মৌলিকতা বজায় রেখে চর্চা করেন তারাই প্রকৃত সাঁওতালি ভাষা দরদী। তাই সবার মুখে একটি দাবি সাঁওতালি ভাষা শিক্ষার ক্ষেত্রে অলচিকি ব্যবহার করতে হবে । আর আমরাও বলতে পারি সাঁওতালি ভাষার মৌলিকতা রক্ষার একমাত্র রক্ষাকবচ অলচিকি ।

কলকাতা লোক সংস্কৃতি(ভবন) মঞ্চ থেকে নরেন হাঁসদা কে সম্বর্ধনা দেওয়া হল

  


কলকাতা:- গতকাল কলকাতা লোকসংস্কৃতি মঞ্চে(ভবন) পুরুলিয়ার বিখ্যাত লোক শিল্পী ও সাঁওতালি সাংস্কৃতি পারসি সাগাড়িয়া নরেন হাঁসদা কে সম্বর্ধনা দেওয়া হল। গতকাল অনুষ্ঠিত হলো কলকাতা লোকসংস্কৃতি ভবনে বিভিন্ন দেশের সংগীত শিল্পী ও নাট্য শিল্পীদের নিয়ে বিশাল লোক সাংস্কৃতিক অনুষ্ঠান।

ভারতবর্ষের বিভিন্ন রাজ্য থেকে এই অনুষ্ঠানে শিল্পীরা অংশগ্রহণ করে এবং সেই সাথে সাথে বাংলাদেশ থেকেও এই অনুষ্ঠানে বহু শিল্পী অংশগ্রহণ করে।সেই বিশাল লোক সাংস্কৃতি(ভবন) মঞ্চ থেকে পুরুলিয়া জঙ্গলমহলের লোকশিল্পী ও সিধু কানু মিশনের নরেন হাঁসদা কে সম্বর্ধনা দেওয়া হল।পারসি সাগাড়িয়া নরেন হাঁসদা সঙ্গে কথা বলে জানা যায় যে, আমি খুবই গর্বিত কলকাতা লোক  সংস্কৃতি(ভবন) মঞ্চ থেকে আমাকে সংবর্ধনা দেওয়ার জন্য এবং আমি এখানকার লোক সংস্কৃতি মঞ্চের কর্তৃপক্ষদের অভিনন্দন জানাই।

আমি একজন সংগীত শিল্পী এবং সেই সংগীত শিল্পী হিসেবে আমার পরিচয় যথেষ্ট আছে এবং সেই সঙ্গে সঙ্গে এখানে আমাকে সম্বর্ধনা দেওয়া হলো সিধু কানু মিশন পরিচালনা করার জন্য। কিন্তু এখানে আমার অবাক লাগছে আমি যে সমাজের জন্য যে ছেলে মেয়েদের জন্য যে সাংস্কৃতিক এর জন্য আমি কাজ করছি। সেই সমাজের সেই মানুষদের কাছে থেকে আমি এখনো পর্যন্ত সম্বর্ধনা ও সহযোগিতা সঠিকভাবে পায়নি।

কিন্তু কিছু দয়ালু মানুষ আছে আমাকে সহযোগিতা করার জন্য এগিয়ে এসেছে এবং সিধু কানু মিশনের চলার পথ কি করে আবার এগিয়ে নিয়ে যায় সে নিয়ে সহযোগিতার হাত বাড়িয়ে দিয়েছে। এবং আমি তাদেরকে ধন্যবাদ জানাই। কলকাতা লোকসংস্কৃতি মঞ্চ থেকে ঐদিন সম্বর্ধনা পাওয়ার পর নরেন হাঁসদার মধ্যে বেশ উৎসাহ লক্ষ্য করা যায়। কলকাতার মতন লোক সংস্কৃতি মঞ্চ থেকে বিভিন্ন দেশের শিল্পীদের মধ্যে তাঁকে সংবর্ধনা দেওয়ার জন্য।

ঐদিন কলকাতা লোক সংস্কৃতি মঞ্চ এর প্রধান অতিথি ও উদ্বোধক হিসেবে উপস্থিত ছিলেন পুরুলিয়ার লোক শিল্পী  ও বিশিষ্ট সমাজকর্মী নরেন হাঁসদা, সম্মানীয় প্রধান অতিথি শুভেন্দু মাইতি লোকসংগীত শিল্পী, স্বপন বসু লোকসংগীত শিল্পী, উদ্বোধক সংগীত সবুজ ঘোষ, ঢোল বাদ্য ধনঞ্জয় রায় আসাম, নাজমুল হাসান প্রভাত বাংলাদেশ ও আরোও উপস্থিত ছিল বিভিন্ন দেশের সংগীত শিল্পী ও নৃত্যশিল্পী।





Friday, 5 April 2019

শালবনী কইমা কলেজে অনুষ্ঠিত হলো সাংস্কৃতিক প্রতিযোগিতা ও সচেতনতা মূলক অনুষ্ঠান

 কইমা শালবনি:- গভর্মেন্ট জেনারেল ডিগ্রী কলেজ শালবনি কইমাতে গত ৩রা ও ৪ঠা এপ্রিল দুদিন ধরে নানান সাংস্কৃতিক অনুষ্ঠান ও সচেতনতা মূলক অনুষ্ঠান ওই কলেজের ছাত্র ছাত্রী ও শিক্ষক-শিক্ষিকারা পালন করল। কলেজের ওই দুই দিনের মধ্যে নানান সাংস্কৃতিক প্রতিযোগিতা ও সচেতন মূলক অনুষ্ঠান দেখানো হয়। দুই দিনের মধ্যে উল্লেখযোগ্য অনুষ্ঠানগুলোর মধ্যে ছিল সংগীত প্রতিযোগিতা, নৃত্য প্রতিযোগিতা এবং ছিল মাদার টোনে শিক্ষা।
বেঙ্গলি সাঁওতালি ও ইংলিশ এই তিনটি ভাষায় মাদার টোন শিক্ষা নিয়ে ওই দিন ওই অনুষ্ঠান করা হয়। ওই দিন ওই কলেজের সমস্ত ছাত্র-ছাত্রীরা তাদের নিজ নিজ মাদারটোন অর্থাৎ মাতৃভাষাতে সংগীত প্রতিযোগিতায় অংশগ্রহণ করে। কলেজের ওই দুই দিনের অনুষ্ঠানের মধ্যে শেষ দিন অর্থাৎ ৪ঠা এপ্রিল প্রধান অতিথি হিসেবে উপস্থিত ছিলেন বিখ্যাত সঙ্গীতশিল্পী ও সিধু কানু মিশন অনাথ আশ্রমের ভারপ্রাপ্ত  নরেন হাঁসদা মহাশয়।
নরেন্দ্র  হাঁসদা মহাশয় জানান যে বর্তমানে আমি নানান গ্রামে গ্রামে ও শহরে গান গেয়ে বর্তমান প্রজন্ম সমাজের মানুষ কে আমি সচেতন করছি। এবং আমাদের এই দেশের নানান সমস্যা অর্থাৎ বাল্যবিবাহ শিশু শ্রমিক জাতে রদ করা যায় ও পিছিয়ে পড়া সমাজের মানুষকে জাতে  সচেতন করা যায় সে নিয়ে আমি দেশের মানুষকে সঙ্গীতের মাধ্যমে বুঝাচ্ছি। ঐদিন শালবনি কইমা কলেজে উপস্থিত নরেন হাঁসদা তার সুরের মাধ্যমে ওই কলেজের সমস্ত ছাত্র-ছাত্রীদের কে মুগ্ধ করেছেন এবং সঙ্গীতের মাধ্যমে নানান সচেতনতা মূলক কথা তিনি বলেছেন।এবং ওই দিন ওই কলেজে প্রধান অতিথি হিসেবে উপস্থিত ছিলেন শিলদা কলেজের প্রফেসর গোপীনাথ টুডু। তিনিও একজন বিখ্যাত সঙ্গীতশিল্পী এবং তিনি বর্তমানে সংগীত নিয়ে রিসার্চ করছেন।


Wednesday, 16 January 2019

অনেক অধিকার মেয়েদের জন্য সংবিধানে লিখে গেছেন বাবাসাহেব আম্বেদকর




To Show The video click below link

http://festyy.com/wVDcqL

১৯৪৭ খ্রিস্টাব্দের ১৫ আগস্ট ভারত স্বাধীন হলে ডঃ আম্বেদকর আইনমন্ত্রী নিযুক্ত হন। মেয়েদের অধিকার দেওয়ার জন্য তিনি সংসদে একটি বিল এনেছিলেন, সেটি হল- ''হিন্দু কোড বিল''। কিন্তু উচ্চবর্ণের সদস্যদের বিরোধিতার জন্য এই বিল পাশ হয়নি। এর প্রতিবাদে তিনি মন্ত্রীসভা থেকে পদত্যাগ করেন (11 অক্টোবর, 1951)।
এই বিলে যা যা ছিল তার কয়েকটি হলো-.
🔹(1) বাল্যবিবাহ রদ :- নারীশিক্ষার স্বার্থে মেয়েদের বিয়ের বয়স সর্বনিম্ন ষোলো বছর করা।
🔹(2) বহুবিবাহ প্রথার বিলোপ :- কোনো কারণ ছাড়া ইচ্ছামতো এক স্ত্রী থাকতে দ্বিতীয়বার বিয়ে করা যাবে না।
🔹(3) বিবাহবিচ্ছেদ আইন :- স্বামী বিনা কারণে ইচ্ছামতো স্ত্রীকে ত্যাগ করতে পারবে না। আবার স্ত্রীও অত্যাচারী বা ব্যভিচারী স্বামীকে পরিত্যাগ করতে পারবে।
🔹(4) মেয়েদের পিতার সম্পত্তিতে অধিকার :- ডঃ আম্বেদকর ছেলেদের মতো মেয়েদেরও পিতৃসম্পত্তিতে সমান অধিকারের ব্যবস্থা করেন এই বিলে।
🔹(5) বিধবা নারীর সম্পত্তি ও দত্তক নেবার অধিকার :-মৃত স্বামীর সম্পত্তিতে স্ত্রীর অধিকার দেওয়া হয় এই বিলে এবং ইচ্ছামতো দত্তকও নিতে পারবে।
▪ডঃ আম্বেদকরের এই চিন্তাধারার মধ্যে সব নারীদের মুক্তির বার্তা আছে। কিন্তু হিন্দুত্ববাদী পত্রপত্রিকায় এই বিলের বিরূপ সমালোচনায় বাবাসাহেব আম্বেদকরকে তীব্র ভাষায় আক্রমণ করা হয়। আম্বেদকরের বিরুদ্ধে গোঁড়া হিন্দুরা ভীষণ ক্ষিপ্ত হয়ে ওঠেন। অগত্যা প্রধানমন্ত্রী নেহরুর ‍নির্দেশেই বিলটিকে প্রত্যাহার করা হয়।
🔴পরবর্তীকালে সংবিধান লেখার সময় মেয়েদের জন্য তিনি সাংবিধানিকভাবে এইসব আইন লিপিবদ্ধ করে গেছেন। তার মধ্যে কয়েকটি হলো -
🔹(আর্টিকেল 14) -সামাজিক, অর্থনৈতিক ও রাজনৈতিক সুযোগের সমান অধিকার
🔹(আর্টিকেল 15) - লিঙ্গ বৈষম্যের উপর নিষেধাজ্ঞা।
🔹(আর্টিকেল 15(iii))- নারীদের উপর ভেদভাবের বিরুদ্ধে উপযুক্ত ব্যবস্থা নেওয়া ।
🔹(আর্টিকেল 39) - জীবিকা নির্বাহের সমান অধিকার এবং সমান কজের সমান বেতন।
🔹(আর্টিকেল 14)- কাজের জায়গায় মানবিক পরিবেশ এবং মাতৃত্বকালীন ছুটি।
🔹আর্টিকেল 24 iii(D) , iii(T) , iii(R) - পঞ্চায়েত রাজ ব্যবস্থায় মহিলাদের জন্য আসন সংরক্ষণ ।
▫এছাড়া আরও অনেক অধিকার মেয়েদের জন্য সংবিধানে লিখে গেছেন বাবাসাহেব আম্বেদকর। আজ মেয়েরা সেসব অধিকার ভোগ করছে। কিন্তু তারা জানে না তাদের এই অধিকার দানের মূল দাতা বাবাসাহেব আম্বেদকর l

বাজাল সরেন মুক্তি সংগ্রামের প্রতীক

মলিন্দ হাঁসদা। বাঁকুড়া। পব।

কার হুকুমে বাজাল কার কথাতে
রুপু সিং তাম্বলিকে কেটে দিলে?
সিদু'র হুকুমে মা গো কানু'র কথাতে
রুপু সিং তাম্বলিকে কেটে দিলাম।

হাতেতে শিকল বাজাল পায়েতে বেড়ি
তুমি যাচ্ছ বাজাল সিউড়ি থানাতে।
হাতে তিরয়ো মাগো পায়ে নুপুর 
আমি যাচ্ছি মাগো সিউড়ি মেলা দেখতে।
সাঁওতালি ভাষার মূল গান---- তকয় হুকুম তে বাজাল তকয় বলেতে------ ভাবানুবাদ। উপরের গানটি বহুল প্রচারিত, প্রচলিত। এই গান আজও সাঁওতাল সমাজ সংস্কৃতিতে প্রবাহমান।

বাজাল সরেন।ভারতের স্বাধীনতা আন্দোলন প্রচার হীন
বীর সৈনিক। বর্তমান ঝাড়খণ্ডের গোড্ডা জেলার সুন্দর পাহাড়ি ঢোকার মুখে বারি বাস স্ট্যান্ড গ্রামে বাড়ি । সাঁওতাল বিদ্রোহের আগে। যে সময় সিধু কানু অত্যাচার, শোষণ থেকে মুক্তি পেতে জনমত তৈরী করতে,হুলের প্রস্তুতি নিতে বিভিন্ন জায়গায় সভা করছেন।সেই সমস্ত সভায় যোগদান করে বাজাল মুক্তির আশা, স্বাদ অনুভব করেন।
সেই সমস্ত অনুপ্রেরণা থেকেই এলাকার সুদখোর, রক্ত শোষক,নারীবাজ ,অত্যাচারী রুপু সিং তাম্বলি মহাজনকে
তরোয়ালের আঘাতে শরীর থেকে মাথা সরিয়ে দিয়ে ছিল। আর হ্যাঁ, বাজাল বাঁশি বাজাতে পারতেন। পরে পুলিশের হাতে ধরা পড়লে, তাঁকে সিউড়ি জেলে নিয়ে যাওয়ার সময়ের এই গান।বাজাল সরেনকে অমর করে রেখেছে। 
ভারতের স্বাধীনতা আন্দোলন সাঁওতালদের মধ্যে যারা দেশের জন্য প্রাণ উৎসর্গ করেছেন, বাজাল সোরেনের নাম অবশ্যই প্রথম সারিতে স্থান পাবে। সাঁওতাল হুলের ইতিহাস কিছু লেখা ,কিছু জানা যায়। কিন্তু বাজাল সরেন কে নিয়ে কিছু লিখতে অপমান বোধ করেন সেই সময় কার লেখককূল।ভারতের স্বাধীনতা আন্দোলন সাঁওতালদের অবদান উল্লেখ করার মতো। কিন্তু ইংরেজ
দের পা চাটা দেশি বিদেশি ঐতিহাসিক রা সাঁওতাল বিদ্রোহীদের সঠিক ইতিহাস লিখতে কুণ্ঠা বোধ করেছেন।অপমান বোধ করেছেন। আর এই জন্যই বাজাল সোরেনের মতো কত যে বীর বান্টা ইতিহাসের আড়ালে চলে গেছেন, তার ইতিহাস যদি পুনঃরুদ্ধার হয় 
তাহলে বদলে যেতে পারে দেশের ইতিহাস। আর এই জন্যই বীরভূমের সিউড়ি 'র আব্দারপুর আদিবাসী সু সার গাঁওতা সাঁওতাল দের ইতিহাস সন্ধানে নেমে পড়েছেন।
2019 সালের 19 শে জানুয়ারি। শনিবার। দুপুর বার টা।আব্দারপুর ফুটবল ময়দানে বাজাল সরেন কে নিয়ে এক সেমিনারের আয়োজন করা হয়েছে।।বাজাল সরেন কে পুনরুদ্ধার প্রচেষ্টায় "স্মরণিকা " প্রকাশের উদ্যোগ নেওয়া হয়েছে। সেমিনারে উপস্থিত থাকবেন - তেতরে পত্রিকার সম্পাদক-মহাদেব হাঁসদা, সিলি পত্রিকার সম্পাদক-কলেন্দ্র নাথ মান্ডী, প্রখ্যাত সাঁওতালি সাহিত্যক-সারদা প্রসাদ কিস্কু, সার সাগুন পত্রিকার সম্পাদক-মলিন্দ হাঁসদা, বাংলা দেশের প্রখ্যাত সঙ্গীতশিল্পী -স্টিফান টুডু, গড্ডা বিশ্ববিদ্যালয়ের অধ্যাপিকা-হোলিকা মারান্ডি, উমুল পত্রিকার সম্পাদক-অধ্যাপক ড.বিনয় সরেন, লেখক ড.জলধর কর্মকার, সাইথিয়ার জয়েন্ট বিডিও- বংশীবদন মুরমু, যাদবপুর কেপিপি'র সুপারেন্টেডেন্ট-রমেশ কিস্কু, সমাজ সেবী- ডা:সুরজিৎ সিং হাঁসদা, সমাজ সেবক ডা:শিব শঙ্কর সরেন, সমাজ সেবী-বড় বাস্কে, বাকজুলু পত্রিকার সম্পাদক- শিবু সরেন। বিশিষ্ট লেখক-গোকুল হাঁসদা, বিখ্যাত সাহিত্যক-লক্ষী নারায়ন হাঁসদা, ঝাড়খণ্ডের খ্যাত নামা লেখক-জনজন্তু সরেন।এবং বিভিন্ন কলেজ বিশ্ববিদ্যালয়ের অধ্যাপক ও ছাত্রছাত্রী।
আয়োজন থাকছে-"বীর বান্টা বাজাল মেলা-2019" 
তাতে মিলবে সাঁওতালি ফুড প্লাজা। বিকাল থেকে পাতা ও লাগড়ে নৃত্য প্রতিযোগিতা। বসবে সাঁওতালি বই পত্রের দোকান পাট। মেলায় পাওয়া যাবে খাঁডি শাড়ি,লুঙ্গি পাঞ্চি, সান্তালি ড্রেস, তির ধনুক, টাঙ্গি, তরোয়াল,, মাদল টামাক, তিরয়ো বানাম, রেগড়া, লিপুর, ঝুনকা পাইন দোকান। 
আয়োজন কমিটির সম্পাদক চন্দ্র মোহন মুরমু জানিয়েছেন-মেলায় মিলবে -বাজু, বাংকি, হাঁসলি, তাগা, মালা ,সুলক, মারাঃ পিঞ্চার, তারা পানকানা,ফিরি দোকান তার সঙ্গে সাঁওতালদের সংসারে ব্যবহৃত সমস্ত সামগ্রী। 
মেলা কমিটির সভাপতি- বড় টুডু এক বার্তায় জানান-সারারাত ব্যাপী থাকছে অর্কেস্ট্রা অনুষ্ঠান। সঙ্গীত পরিবেশন করবেন - প্রখ্যাত, বিখ্যাত, নামী দামি সঙ্গীতশিল্পী- কল্পনা হাঁসদা, রথীন কিস্কু, স্টিফান টুডু, কেরানী হেমব্রম, সাগুন কুইলি-ডিগির সরেন। 

বাজাল সরেন শুধু শহীদ নন। বাজাল যে জাদুকরী তিরয়ো বাদক। বহু বছর পর। বাজালে আবির্ভাব আবার আব্দারপুর ময়দানে। তাঁর উপস্থিতি অনুভব করতে কাতারে কাতারে, হাজারে হাজারে সাঁওতাল মানুষজন হাজির হবেন বলে অনুমান করা হচ্ছে। 

বীরভূম জেলার সিউড়িতে স্বাধীনতা সংগ্রামী বাজাল এর নামে মেলা

 বীরভূম জেলার সিউড়ির বড়বাগানের আব্দারপুর ফুটবল ময়দানে আয়োজিত হতে চলেছে ‘বীরবান্টা বাজাল মেলা-২০১৯’। ১৯শে জানুয়ারি এই মেলা আয়োজিত...